जलवायु-अनुकूल विकास मॉडल की मांग
देहरादून: हरेला पर्व के अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल ने उत्तराखंड में पिछले 25 वर्षों के दौरान 46,203 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि राज्य में विकास परियोजनाओं के साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए जलवायु-अनुकूल विकास मॉडल अपनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
आरटीआई से प्राप्त जानकारी के अनुसार, राज्य गठन के बाद सड़क, खनन, बिजली, ट्रांसमिशन लाइन, सिंचाई और अन्य परियोजनाओं के लिए बड़ी मात्रा में वन भूमि डायवर्ट की गई है। इनमें सबसे अधिक 10,070 हेक्टेयर भूमि सड़क परियोजनाओं और 9,289 हेक्टेयर भूमि खनन कार्यों के लिए उपयोग में लाई गई, जबकि 20,837 हेक्टेयर भूमि “अन्य” श्रेणी में शामिल है।
अनूप नौटियाल ने बताया कि कुल वन भूमि डायवर्जन का लगभग 47 प्रतिशत (21,618 हेक्टेयर) अकेले देहरादून जिले में हुआ है। उन्होंने कहा कि दून घाटी और शिवालिक क्षेत्र की वहन क्षमता सीमित है और अनियोजित विकास भविष्य में गंभीर पर्यावरणीय संकट पैदा कर सकता है।
उन्होंने सरकार से प्राकृतिक वनों को नुकसान पहुंचाने वाली परियोजनाओं की समीक्षा करने, वैज्ञानिक कैरिंग कैपेसिटी के आधार पर विकास की योजना बनाने और पर्यावरणीय कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने की मांग की। साथ ही प्रतिपूरक वनीकरण की जानकारी सार्वजनिक करने और उसकी प्रभावी निगरानी पर भी जोर दिया।
अनूप नौटियाल ने कहा कि हिमालय के प्राकृतिक वनों की भरपाई केवल पौधारोपण से संभव नहीं है। उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा ही जलवायु परिवर्तन से निपटने का सबसे प्रभावी उपाय है।
